Wednesday, November 17, 2010

रोना छोड़ दिया मैंने

गम ने गम का साथ छोड़ दिया,
मैंने भी अब रोना छोड़ दिया।
लोगों ने कहा तुमने मुस्कुराना छोड़ दिया।
मैंने कहा कि मैंने दिल लगाना छोड़ दिया।
करता है ज़ख़्म जब दिल पर कोई,
टूटता है दिल कही और रोता है कही कोई।
बिसात ये दिल की है,
दिमाग को समझ नही आएगी।
सभाल कर पाँव रखियेगा वरना पैरों तले धरती खिसक जायेगी।
कही तो यहाँ घोडा भी सरपट लम्बा दौड़ जाता है,
कभी विशाल हाथी एक झटके में गिर जाता है।
तभी तो प्यार के दो अदना सिपाही दोनों रानी-महाराजा को शिकस्त ,
और बनाते है अपनी एक नयी दुनिया एक आइने के तहत।
तोड़ देते है ये हर बंदिशे हर ताले की चाभी ये रखते है,
दे सके शिकस्त सबको ऐसी हिम्मत अपने अन्दर ये रखते है।
कभी रुठते कभी मानते कभी गुस्सा है ये करते,
फिर भी हमेशा साथ है ये चलते।
न फ़िक्र ज़माने की इन्हें,
रोक सकेगा अब कौन कहाँ इन्हें।

कौस्तुभ 'मनु'

Friday, November 12, 2010

दिल्ली में दिल से 'सोचिये'

शाख से टूट के बिखर जाते है पत्ते कुछ इस तरह ।
जैसे इनका शाख से कोई नाता नही ,
ज़िन्दगी से चले जाते है लोग कुछ इस तरह ,
जैसे उनका हमसे कोई वास्ता नही .
बरसों की दोस्ती टूट जाती है कुछ इस तरह ,
जैसे उन्हें अब हमारी कोई फ़िक्र ही नही।
काश देती साथ तुम हर पल मेरा कुछ इस तरह ,
जैसे मुझसे दूर जाने की तुझे ज़रूरत नहीं .
अब रह गया हूँ मै तेरी ज़िन्दगी में कुछ इस तरह ,
जैसे अमावास की रात में चांदनी की बिसात नहीं ।
खुशिया फिर भी बिखर जाती है ज़िन्दगी में कुछ इस तरह,
जैसे इनका अब मेरे सिवा और कोई साथी नहीं।


कौस्तुभ 'मनु'

Wednesday, October 27, 2010

तन्हाई से एक मुलाकात

एक रात अचानक से कोई मुझे सोते से उठाने लगा। सामने देखा तो मेरी तन्हाई खड़ी मुस्कुरा रही थी। मैंने गुस्से से उसकी तरफ देखा और पूछा, 'क्या हुआ! तुम फिर क्यों आ गयी आज। उसने मासूमियत से मेरी तरफ देखा और बोली , 'मै क्या करती, मै आज तनहा थी, सोचा तुमसे तन्हाई बाँटने चली आऊँ।' ये कह कर वो हँस पड़ी और फिर मै भी हँस पड़ा। मैंने उसे बुलाया अपने पास बैठाया और उसकी खुबसूरत चहरे को निहारता रहा। वो शर्मा कर बोली, ' ऐसे क्या देख रहे हो आज, क्या मै अब तक नही थी तुम्हारे पास।' मैंने कहा, ' तुममे है सब कुछ खास, यादें होती है मेरे पास। ' वो मुस्कुराती, इठलाती, बलखाती चली और थोड़ी दूर जा कर बोली, ' गुस्से से घूरा था तुने मुझे,अब न आउंगी कभी मिलने तुझे। ' मैंने प्यार से उसे देखा फिर आवाज़ देकर अपने पास बुलाया, 'प्यार में तकरार तो अच्छी है , पर कभी न मिलने की ये हसरत कैसी है?' उसने शरारत भरी नज़रो से मुझे देखा और एक टक मुझे देखती हुई धीरे से बोली, ' कल मै आउंगी और खोलूंगी यादों की किताब, दिखाउंगी तुम्हे यादों के सुनहरे-फीके महताब। ' अचानक मेरी आँख खुली और खुद को ज़मीन पर पड़ा पाया। तो मन् में सिर्फ यही बुदबुदाया, ' तन्हाई है इतनी दिलचस्प अगर, तो इससे कोई शिकवा नही हमें। दोस्ती कर लिया जब तुमने हमसे, तब ये दोस्ती निभायेंगे हम भी तुमसे।'

कौस्तुभ 'मनु'