कौस्तुभ 'मनु'
Saturday, April 19, 2014
यादों संग आंखमिचौली
कौस्तुभ 'मनु'
Friday, February 1, 2013
ख्याल-ए-इश्क़
टूटे सपनों को जोड़ने की आदत अब भी है,
भूली यादों को याद करने की आदत अब भी है।
तेरे संग बिताये लम्हों को आज़माना अब भी है,
तेरे होठों पर मुस्कुराहट लाना अब भी है।
तेरे संग दो कदम चलने की हसरत अब भी है,
तेरे आसुओं को मुट्ठी में बांधने की हसरत अब भी है।
तेरी निगाहों में डूब जाने की चाहत अब भी है,
तेरे दिल में जगह बनाने की गुज़ारिश अब भी है।
तेरे साथ हुल्लड़ करने का बचपना अब भी है,
तेरे संग कुछ पल बिताना अब भी है।
तेरे संग सुबह की ओस की बूंदों को समेटना अब भी है,
तेरे साथ रात की चांदिनी को निहारना अब भी है।
तेरे संग कुछ सवालों के जवाब ढूँढना अब भी है,
तेरे साथ कुछ शरारते करनी अब भी है।
तेरी सोच के दायरों का ख़याल अब भी है,
'मनु' को अपनी वफ़ा पर ऐतबार अब भी है।
तू बाहों में सिमटने को बेताब अब भी है,
मेरी इबादत में तेरा ज़िक्र अब भी है।
कौस्तुभ 'मनु'
Tuesday, November 6, 2012
नकाब
दिखता है हर किसी की आँखों में खुदगर्जी का अक्स।
पूछता जब भी 'मनु' इनसे इनका सच,
निकल जाते निगाहें बचा कर सब।
कौस्तुभ 'मनु'
Friday, September 14, 2012
इनायत
मानो जैसे उसे सिर्फ मेरी ही आस थी .
शिकवा करते भी थे तो वो मानती थी ,
बुझे रहते थे तो वो हमे हसती थी .
Friday, June 15, 2012
ख्वाबों की कहानी
तो ख्वाहिशों का कोई मोल न होता.
करते सिर्फ़ पाने की चाह बस,
पर मिलने का अहसास न होता.
न होती दिलों में आरजू कोई,
कोई दिल में गम ही न होता.
कौस्तुभ 'मनु'
Wednesday, April 18, 2012
खोज
लोग कहते बस तोड़ना था दिल जो है पास तेरे.
मुस्कुरा कर फिर चल पड़ता 'मनु',
ढूंढने किसी दिल को ख़ास.
Friday, January 27, 2012
साया
कौस्तुभ 'मनु'
Sunday, January 15, 2012
जख्म -ए-जिंदगी
देगी शिकस्त तुझे मेरी बंदगी.
न छोड़ कसर एक वार का भी,
है जुस्तजू मुझे और लड़ाई सहने का भी.
कस ले कमर हो जा अब तैयार तू,
क्यूंकि अब खाएगी शिकस्त तू.
नहीं बनना पोरस और सिकंदर मुझे,
बस हो जिंदगी तेरा खुबसूरत साथ मुझे.
चाहे लड़ कर मुझसे शिकस्त अपनाये,
या फिर महक बनकर मुझमें समाये.
कौस्तुभ 'मनु'
Saturday, December 10, 2011
प्यार में इतनी तड़प न होती .
न दिल का यूँ टूटना होता,
दिल में इतनी कसक न होती .
- कौस्तुभ 'मनु'
Wednesday, November 9, 2011
जिंदगी के नाम
Thursday, November 3, 2011
ज़ज्बात
Wednesday, October 5, 2011
जिंदादिल ज़िन्दगी
Monday, August 29, 2011
मैखाना
अब तो बन बैठा है दिल ही मेरा गम के जामों का आशियाना.
नहीं रही याद अब कोई बाकी दिल में,
इसी लिए दिल अब मैखाने को नहीं जाता है.
फितूर जो था दिल में वो कहीं उड़न छु हो गया,
दिल का बागी परिंदा दूर कही ऊचें आकाश में खो गया.
बन जाएगा अब ये भी अब चालाक धूर्त दुनिया की तरह,
खड़े करेगा ये धक्यानुशी वैमनस्य की वजह.
कौस्तुभ 'मनु'
Tuesday, August 23, 2011
Wednesday, June 8, 2011
मेरी ज़िन्दगी
मानो खों गयी हो ख़ुशी कहीं,
पर वादा है मेरा तुझसे ऐ ज़िन्दगी,
ढूंढ़ कर वापस लाऊंगा हर ख़ुशी अपनी।
बुन ले हज़ार ताने बाने नाना-प्रकार,
पर दूंगा शिकस्त तुझे मैं हर एक बार।
मानूंगा नहीं मै भी इतनी जल्दी हार,
चाहे मिले हर दिन मुझे अश्रु बार-२।
कौस्तुभ 'मनु'
हमसफ़र
तो कैसे रहेगा उसे हमारे वापस आने की आस।
खुद हे कदम लौट कर वापस चल पड़ेंगे,
जब वो हमे दिल से अपने पास बुलाएँगे।
कौस्तुभ 'मनु'
Wednesday, May 18, 2011
ज़िन्दगी हर पल
आज अपनी ही तलाश में कदम उठ चलते है।
कभी तेरे दिल से आने वाली आहट का राज़ पूछ्ते थे,
आज अपने ही कदमों की आवाज़ को खामोश रखते है।
कभी मिलते थे सबसे मुस्कुराते हुए,
आज दिखते ख़ामोशी में दूसरो की ख़ुशी में खुद को सँभालते हुए।
करते थे फ़िक्र हर बात की हम हर पल,
बेफ़िक्री में अब घूमते है कदम आज कल
कौस्तुभ 'मनु'
Wednesday, April 6, 2011
'कुछ' हम
दिल में ऊपर वाले का खौफ है ।
दिखता उन्माद चेहरे पर कम है,
फिर भी ज़बान हमारी बेशर्मी में तंग है।
बुरे वक़्त में भी मुस्कुराते हम है,
औरों को कभी कभी इसी बात का गम है।
जहाँ सब को आगे बढ़ने की जल्दी है,
हमें खुद को ऊपर उठाने की तेज़ी है।
जहाँ सब को अपनो के लिए समय की कमी है,
हमें अजनबियों के लिए भी आखों में नमी है।
शायद इसी लिए हम सब के लिए अप्रैल के फूल है,
फिर भी हम अपने आप में कूल है ।
कौस्तुभ 'मनु'
Monday, April 4, 2011
कशिश
माँ की रोक में, या फिर पिता की टोक में,
उसकी बातों में, या फिर अकेले अँधेरी रातों में,
कशिश है फिज़ाओ में हर तरफ।
प्रोफेसर की डाट में , या फिर विद्यार्थी की काट में,
गर्लफ्रेंड से तकरार में, या फिर बेपनाह प्यार में,
कशिश है फिज़ाओ में हर तरफ।
सुबह को गैस पर उबलते दूध में , या फिर रात को नींद ख़राब करते शोर में,
रोज रोज की लम्बी कूद में, या फिर हमे डराते चोर में,
कशिश है फिज़ाओ में हर तरफ।
बॉस की फटकार में,या फिर सह-कर्मी की निंदा में,
मेट्रो में भीड़ से होती तकरार में, या फिर और रुपये कमाने की चिंता में,
कशिश है फिज़ाओ में हर तरफ।
कौस्तुभ 'मनु'
Wednesday, November 24, 2010
असमंजस की एक रात
पिछली कई रातों की तरह आज रात भी देर तक मुझे नींद नही आ रही है । मैंने रात एक निशाचर प्राणी की तरह काटने से बेहतर छत पर जाकर पूर्णिमा की चान्दिनी का आनंद लेना बेहतर समझा। थोडा टहल कर आस-पास का मुआयना करने पर ज्ञात हुआ की बगल के घर में अभी भी टीवी चल रहा है। शर्माजी अपने कुत्ते को शांत कराने में लगे हुए है। ये देख कर मन् को तसल्ली हुई कि सिर्फ मैं अकेला जागता प्राणी नही हूँ।
टहलते हुए थोड़ी थकान लगी तो मैं दीवाल की टेक लगाकर बैठ गया और ऊपर स्वच्छ आकाश को देखने लगा। तभी थोड़ी देर में मुझे आस-पास कुछ हलचल सी लगी । मैंने नज़रे घुमा कर देखा तो कुछ धुंधली आकृतियाँ दिखाई देती नज़र आई । मैंने मन् में खुद से कह डाला , ' मनु जी आज तो लगता है आप भी भूतो की मंडली में शामिल होने जा रहे है । फिर मैंने अपनी आखें बंद की और मन् ही मन् अपने आप प्रभु राम का जाप शुरू हो गया। मुझे लगा अयोध्या में जितना जाप लोग लगा दिए थे उतना तो मैं अगले कुछ मिनटों में लगा डालूँगा। अगले ही पल मुझे एक अजीब से रूमानी स्पर्श का अहसास हुआ। और मेरी सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी। मेरी हालत उस कटे हुए बकरे की तरह थी कि जो तड़पता भी था तो डर डर के । अचानक एक सुन्दर सी मधुर आवाज़ मेरे कानो में पड़ी। मैंने ध्यान से सुनने की कोशिश की।
"कौस्तुभ, क्या हुआ ? क्या तुम हमे भूल गये हो ? आँखे तो खोलो। हम इतने दिंनो से तुमसे मिलना चाह रहे है और तुम हो की मिलते ही नही हो। " ये कह कर वो मेरा हाथ झकझोरने लगी । मैंने हिम्मत जुटाई और धीरे से आँख खोली और तपाक से बोला क्या तुम लोग भूत हो । ये सुन कर वो सब एक दुसरे को देख कर मुस्कुराने लगी। एक ने मुझे गाल पर हलके से चपत लगायी और हसने लगा। ' भूत लोग ऐसा नहीं करते है"। मैंने कहा, ' फिर कैसे करते है "? वो बोली, 'अब हमे कैसे मालूम होगा, अगर पता होता तो ज़रूर बताते। " तो फिर तुम लोग हो कौन " , मैंने अचंभे से बोल बैठा । इसने कहा ' अभी भी नही पहचाना '! मैंने न में सर हिला दिया । " ध्यान से देखो हमें, क्या कुछ समझ में आ रहा है" । मैंने ध्यान से देखा तो पता चला की वो आकृतिया आपस में दो के समूह में जुडी हुई है। जिसमे से एक थोड़ी भद्दी, थोड़ी उदास थी। वही दूसरी सुन्दर थी और खुश थी। मै अभी भी अनजान सा उन सब को देख रहा था। एक ने धीरे से मेरे कानों के पास आकर बुदबुदाया , हम तुम्हारी यादें है । जिन्हें तुम अब ध्यान नही देते । मैं हैरानी से उन सब को देखने लगा । " हम सब तो तुम्हारी ज़िन्दगी का हिस्सा है । हमसे दूर कैसे जा सकते हो तुम?" अचरज से मेरी आँखे खुली की खुली रह गयी ।
क्रमशः
कौस्तुभ शुक्ल 'मनु'